Post image for शत अपराध शमन व्रत (Shat Apradh Shaman Vrata)

शत अपराध शमन व्रत (Shat Apradh Shaman Vrata)

by Acharya Shashikant on January 2, 2009 · 8 comments

in Festivals


हम मनुष्य कर्मों से बंधे हुए हैं। अपने कर्म के अनुसार हमें उसका फल भी भोगना होता है। अच्छे कर्म का अच्छा फल मिलता है और अपराध के लिए दंड भी मिलता है। हमसे जाने अनजाने अपराध भी हो जाता। ईश्वर अपनी संतान का अपराध क्षमा करने देता है जब उसकी संतान अपराध मुक्ति के लिए प्रार्थना करता है एवं अपराध शमन के लिए व्रत करता है।

अपराध शमन व्रत (Shat Apradh Shaman Vrata) महात्मय
शत अपराध शमन व्रत मार्गशीर्ष मास में द्वाद्वशी के दिन शुरू होता है। इस तिथि से प्रत्येक द्वादशी के दिन इस व्रत को करने का विधान है। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति जाने अनजाने शत अपराध करता है उस अपराध का शमन होता है और व्यक्ति अपराध मुक्त हो कर मृत्यु के पश्चात ईश्वर के समझ पहुंचता है जिससे सुख और उत्तम गति को प्राप्त होता है। ब्रह्मा जी ने इस व्रत के महत्व के विषय में कहा है कि यह व्रत अनंत व इच्छित फल देने वाला है। यह व्रत करने वाला स्वस्थ एवं विद्वान होता है और वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का भागी होता है।

अपराध मुक्ति व्रत कथा – Shat Apradh Shaman Vrata Katha
एक समय की बात है राजा इक्ष्वाकु ने परम श्रद्धेय महर्षि वशिष्ठ जी से प्रश्न किया “हे गुरूदेव! हम लाख चाहने के बावजूद जाने अनजाने अपने जीवन में शताधिक पापकर्म तो अपने सम्पूर्ण जीवन में कर ही लेते हैं। इन अपराधों के कारण मृत्योपरांत हमें और फिर हमारे वंशजों के लिए दु:ख का कारण होता है। हे महाप्रभो! क्या कोई ऐसा व्रत है जिसको करने से सभी प्रकार के पाप मिट जाएं और हमें महाफल की प्राप्ति हो। राज की बातों को सुनकर महर्षि वशिष्ठ ने कहा, हे राजन्! एक व्रत ऐसा है जिसको विधि पूर्वक करने से शताधिक पापों का शमन होता है।

महर्षि ने राजा को शत अपराध बताते हुए कहा कि हे राजन्! शास्त्रों में जो शत अपराध बताये गये हैं उनके अनुसार चारों आश्रमों में अनासक्ति, नास्तिकता, हवन कर्म का परित्याग, अशच, निर्दयता, लोभवृत्ति, ब्रह्मचर्य का पालन न करना, व्रत का पालन न करना, अन्न दान और आशीष न देना, अमंगल कार्य करना, हिंसा, चोरी, असत्यवादिता, इन्द्रियपरायणता, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या, घमंड, प्रमाद, किसी को दु:ख पहुंचने वाली बात कहना, शठता, इन्द्रियपरायणता, क्रोध, द्वेष, क्षमाहीनता, कष्ट देना, प्रपंच, वेदों की निंदा करना, नास्तिकता को बढ़ावा देना, माता को कष्ट देना, पुत्र एवं अपने आश्रितों के प्रति कर्तव्य का पालन न करना, अपूज्य की पूजा करना, जप में अविश्वास, पंच यज्ञ का पालन न करना, संध्या-हवन-तर्पण नहीं करना, ऋतुहीन स्त्री से संसर्ग करना, पर्व आदि में स्त्री संग सहवास करना, परायी स्त्री के प्रति आसक्त होना, वेश्यागमन करना, पिशुनता, अंत्यजसंग, अपात्र को दान देना, माता-पिता की सेवा न करना, पुराणों का अनादर करना, मांस मदिरा का सेवन करना, अकारण किसी से लड़ना, बिना विचारे काम करना, सत्री से द्रोह रखना, कई पत्नी रखना, मन पर काबू न रखना, शास्त्र का पालन न करना, लिया गया धन वापस न करना, गुरू द्वारा दिये गये ज्ञान को भूलना, पत्नी अथवा पुत्र और पुत्री को बेचना, बिलों में पानी डालना, जल क्षेत्र को दूषित करना, वृक्ष काटना, भीख मांगना, स्ववृत्ति का त्याग करना, विद्या बेचना, कुसंगति, गो-वध, स्त्री-हत्या, मित्र-हत्या, भ्रूणहत्या, दूसरे के अन्न मांग कर गुजर करना, विधि का पालन न करना, कर्म से रहित होना, विद्वान का याचक होना, वाचालता, प्रतिग्रह लेना, संस्कार हीनता, स्वर्ण चोरी करना, ब्रह्मण का अपमान और हत्या करना, गुरू पत्नी से संसर्ग करना, पापियों से सम्बन्ध रखना, कमजोर और मजबूरों की मदद न करना ये सभी शत अपराध के कहे गये हैं।

महर्षि वशिष्ठ ने कहा हे महाबाहो ईक्ष्वाकु इन अपराधो से मुक्ति के लिए भगवान सत्यदेव की पूजा करनी चाहिए। भगवान सत्यदेव अपनी प्रिया लक्ष्मी के साथ सत्यरूप व्रज पर शोभायमान हैं। इनके पूर्व में वामदेव, दक्षिण में नृसिंह, पश्चिम में कपिल, उदर में वराह एवं उरू स्थान में अच्युत भगवान स्थित हैं जो अपने भक्तों का सदैव कल्याण करते हैं। शंख, चक्र, गदा व पद्म से युक्त भगवान सत्यदेव जिनकी जया, विजया, जयंती, पापनाशिनी, उन्मीलनी, वंजुली, त्रिस्पृशा एवं ववर्धना आठ शक्तियां हैं, जिनके अग्र भाग से गंगा प्रकट हुई है। भक्तवत्सल भगवान सत्यदेव की पूजा मार्गशीर्ष से शुरू करनी चाहिए और प्रत्येक पक्ष की द्वादशी के दिन विधि पूर्वक पूजा करके व्रत करना चाहिए।

अपराध शमन व्रत विधान Shat Apradh Shaman Vrata Puja Vidhi
दोनों पक्ष की द्वादशी तिथि को नित्य क्रियाओं के पश्चात स्नान करके भग्वान सत्यदेव की पूजा एवं व्रत का संकल्प करना चाहिए। संकल्प के बाद भगवान सत्यदेव और देवी लक्ष्मी की स्वर्ण प्रतिमा दूध से भरे कलश पर स्थापित करके सबसे पहले इनकी अष्ट शक्तियों की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद लक्ष्मी सहित भगवान सत्यदेव की षोडशोपचार सहित पूजा करनी चाहिए। पूजा के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा सहित विदा करना चाहिए। वर्ष पर्यन्त दोनों पक्षों में इस व्रत का पालन करने के बाद व्रत का उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा एवं स्वर्ण प्रतिमा ब्राह्मण को देना चाहिए और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

{ 8 comments… read them below or add one }

subhash chand mahobiya August 6, 2011 at 5:11 am

panditjee jo gareeb hai unke liye saral pooja batlaeye jiskebaad ye sone ki pratima bastra daan karne bala brat kar sake krapa margdarshan kare

Reply

suryaprakashsoni July 21, 2012 at 3:17 pm

mai apne aaj tak k samay me bahut bure kam bhi kiya hounga is liye main vrat karana chahta hun.

Reply

sumit agarwal August 25, 2012 at 1:52 pm

sdds

Reply

PT . MANGAT RAM November 10, 2012 at 1:01 am

KARMO KA PHUL BHOGNA HE PURE GAA. ISKO ISHVER BHI MAF NAHIAN KER SKTA. ESA VEDON KA MUT HIA.

Reply

manju March 9, 2013 at 10:16 am

panditjee jo gareeb hai unke liye saral pooja batlaeye jiskebaad ye sone ki pratima na deni pade kuki aaj ke waqt me sona itna mehga ho gaya hai or bhagwan to bhakt ki sadha dekhte hai unhe sone se kya lena dena hai .

Reply

rishi July 15, 2013 at 5:17 pm

to pandit ji ne akhir imotional robery karne ka irada jag jahir kar hi diya ……dhanyawad pandit ji ………iske alawa koi sasta trika dundiye pandit ji …..sona to bhaut duralab ho gaya hai chandi ka nam lete to sochte bi ……or copper ka lete to krwane ki sochte …..or steel ki bolte to pandit ji chahe kuch bi hota aapp ko jarur invite krte ……..wah re mere desh ki khuli chour jat……JAI HIND………….

Reply

Rewati Ram Thakur March 15, 2014 at 11:57 am

baba ji kahte hein shani brat karo. kya mere liye brat shubh rhega?

Reply

Joginder Gogaliya March 8, 2015 at 11:27 am

Jai satya dev ki

Reply

Leave a Comment

Previous post: