Sankasthar chaturthi katha vrat vidhi (संकष्टहर चतुर्थी कथा व्रत विधि)
गजमुख, गजानन, गणेश ये नाम हैं मंगल करने वाले और विघ्न हरने वाले शिव और पार्वती के मानस पुत्र गणपति का. गणिपति को चतुर्थी तिथि अत्यंत प्रिय है इनमें संकष्टहर चतुर्थी का अपना विशेष महत्व है.
संकष्टहर चतुर्थी व्रत महात्मय(Sankasthar Chaturthi vrat Mahatmya)
संकष्टहर चतुर्थी के दिन गणेश जी की पूजा का विधान है. गणपति मंगलकारी और शुभ लाभ देने वाले हैं. इनकी पूजा से भक्तों के संकट और कष्ट समाप्त हो जाते हैं विशेषकर जो माघ कृष्ण पक्ष के दिन चन्द्रमा और मंगल सहित गणपति की पूजा एवं व्रत रखते हैं उनके लिए गणपति अति मंगलकारी होते हैं.
संकष्टहर चतुदर्शी कथा (Sankasthar Chaturdasi Katha)
कथा के अनुसार भारद्वाज मुनि और पृथ्वी के पुत्र मंगल की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर माघ कृष्ण पक्ष में चतुर्थी (Magha Krishna Paksha Chaturthi) तिथि को गणपति ने उनको दर्शन दिया था ). ग्रह एवं नक्षत्र जिनके अंश हैं उस गजानन के वरदान के फलस्वरूप मुनि कुमार को इस दिन मंगल ग्रह के रूप में सौर मण्डल में स्थान प्राप्त हुआ. मुनि कुमार को यह भी वरदान मिला कि माघ कृष्ण पक्ष की चतुदर्शी जिसे संकष्टहर चतुर्थी (Sankasthar Chaturthi) के नाम से जाना जाता है उस दिन जो भी गणपति का व्रत रखेगा उसके सभी प्रकार के कष्ट एवं विघ्न समाप्त हो जाएंगे.
एक अन्य कथा के अनुसार भगवान शंकर ने गणिपति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि माघ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (Magha Krishna Chaturthi) तिथि को चन्द्रमा मेरे सिर से उतरकर गणेश के सिर पर शोभायमान होगा. इस दिन गणेश जी की उपासना और व्रत त्रि-ताप का हरण करने वाला होगा. इस तिथि को जो श्रद्धा भक्ति से युक्त होकर नियम निष्ठा से गणेश जी की पूजा करेगा उसे मनोवांछित फल प्राप्त होगा.
संकष्टहर चतुर्थी व्रत विधि (Procedure of Sankasthar Chaturthi Vrat):
संकष्टहर व्रत सभी प्रकार के संकट का अंत करने वाला है. इस दिन प्रात: काल स्नान करके पवित्र वस्त्र धारण करें और फिर गणपति सहित शिव और माता पार्वती की पूजा करें. भगवान गणेश की प्रसन्नता हेतु भजन कीर्तन करें और गणेश स्तोत्र का पाठ करें. संध्या समय चन्द्रोदय के पश्चात मूषक वाहन पर आसीन एवं हाथ में परशु, पाश धारण किये हुए गणपति की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा दें. प्राण प्रतिष्ठा के लिए आप हाथ में चावल लेकर इस मंत्र का उच्चारण करें "ऊँ गं गणपतये सआयुध सवाहन इहा आग्च्छ इह तिष्ठ" अब चावल मूर्ति पर छोड़ें.
गणिपति जी की प्राण प्रतिष्ठा के बाद फूल, अक्षत, चंदन, रोली, कुमकुम, दुर्वा, फूल माल लेकर षोडषोपचार सहित पूजन करें. गणेश जी को लड्डू का भोग लगाएं. अब सपरिवार गणेश जी की आरती करें और प्रसाद वितरण करें.
इस दिन गणेश जी की पूजा के साथ ही चन्द्रमा और मंगल ग्रह की पूजा अति शुभकारी और मंगलदायी है. व्रत का उत्तम फल प्राप्त करने के लिए गणपति की पूजा के पश्चात चन्द्र देव व मंगल ग्रह की पूजा करके उन्हें आर्घ्य दें.
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