Parma Ekadashi Vrat vidhi katha (परमा हरिवल्लभा एकादशी व्रत विधि एवं कथा)

by Acharya Shashikant on November 4, 2008 · 5 comments

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अधिक मास में कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है वह हरिवल्लभा अथवा परमा एकदशी के नाम से जानी जाती है ऐसा श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा है (additional months krishna paksha Parma Ekadashi). भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत की कथा व विधि भी बताई थी. भगवान में श्रद्धा रखने वाले आप भक्तों के लिए यही कथा एवं विधि प्रस्तुत है.

परमा एकादशी कथा (Parma Ekadasi Vrat Katha)

: काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ निवास करता था. ब्राह्मण धर्मात्मा था और उसकी पत्नी पतिव्रता. यह परिवार स्वयं भूखा रह जाता परंतु अतिथियों की सेवा हृदय से करता. धनाभाव के कारण एक दिन ब्रह्मण ने ब्रह्मणी से कहा कि धनोपार्जन के लिए मुझे परदेश जाना चाहिए क्योंकि अर्थाभाव में परिवार चलाना अति कठिन है.

ब्रह्मण की पत्नी ने कहा कि मनुष्य जो कुछ पाता है वह अपने भाग्य से पाता है. हमें पूर्व जन्म के फल के कारण यह ग़रीबी मिली है अत: यहीं रहकर कर्म कीजिए जो प्रभु की इच्छा होगी वही होगा। ब्रह्मण को पत्नी की बात ठीक लगी और वह परदेश नहीं गया. एक दिन संयोग से कण्डिल्य ऋषि उधर से गुजर रहे थे तो उस ब्रह्मण के घर पधारे। ऋषि को देखकर ब्राह्मण और ब्राह्मणी अति प्रसन्न हुए. उन्होंने ऋषिवर की खूब आवभगत की.

ऋषि उनकी सेवा भावना को देखकर काफी खुश हुए और ब्राह्मण एवं ब्राह्मणी द्वारा यह पूछे जाने पर की उनकी गरीबी और दीनता कैसे दूर हो सकती है, उन्होंने कहा मल मास में जो कृष्ण पक्ष की एकादशी (Mal mass Krishna Paksha Ekadashi) होती है वह परमा एकादशी (Parma Ekadasi) के नाम से जानी जाती है, इस एकादशी का व्रत आप दोनों रखें. ऋषि ने कहा यह एकादशी धन वैभव देती है तथा पाप का नाश कर उत्तम गति भी प्रदान करने वाली है. किसी समय में धनाधिपति कुबेर ने इस व्रत का पालन किया था जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें धनाध्यक्ष का पद प्रदान किया.

समय आने पर सुमेधा नामक उस ब्राह्मण ने विधि पूर्वक इस एकादशी का व्रत रखा जिससे उनकी गरीबी का अंत हुआ और पृथ्वी पर काफी समय तक सुख भोगकर वे पति पत्नी श्री विष्णु के उत्तम लोक को प्रस्थान कर गये.

परमा एकादशी व्रत विधान (Parma Ekadashi Vrat vidhan)

परमा एकादशी व्रत की विधि बड़ी ही कठिन है. इस व्रत में पांच दिनों तक निराहार रहने का व्रत लिया जाता है. व्रती को एकादशी के दिन स्नान करके भगवान विष्णु के समक्ष बैठकर हाथ में जल एवं फूल लेकर संकल्प करना होता है. संकलप के बाद भगवान की पूजा करनी होती है फिर पांच दिनों तक श्री हरि में मन लगाकर व्रत का पालन करना होता है. पांचवें दिन ब्रह्मण को भोजन करवाकर दान दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात व्रती को स्वयं भोजन करना होता है.

{ 5 comments… read them below or add one }

sachin shinde March 26, 2010 at 11:49 am

i am faith in ekdashi.

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shachi February 13, 2011 at 4:38 pm

i like krishna radhey .

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vilas August 21, 2011 at 2:57 pm

lordkrushna bless you

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kuldeep May 16, 2012 at 8:20 am

i want to know all ekadashi vrat vidhi so i request that anyone tell me that how i do all ekadashi vrat differently.

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Neha Sharma July 12, 2015 at 8:22 am

Nice but I m not doing 5 days sorry

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