Martand Saptami vrat katha vidhi (आरोग्य दायक मार्तण्ड सप्तमी)
ऋग्वेद में सूर्य को सबसे अधिक शक्तिशाली और प्रत्यक्ष देवता के रूप में सम्मानित किया गया है। इनके अनेक नामों में से एक नाम है मार्तण्ड। सूर्य के इस रूप की उपासना पौष शुक्ल पक्ष में सप्तमी तिथि की जाती है।
सूर्य महात्मय (Surya Mahatmya)
सूर्य भगवान आदि देव हैं अत: इन्हें आदित्य कहते हैं इसके अलावा अदिति के पुत्र के रूप में जन्म लेने के कारण भी इन्हें इस नाम से जाना जाता है। सूर्य के कई नाम हैं जिनमें मार्तण्ड भी एक है जिनकी पूजा पौष मास में शुक्ल सप्तमी को होती है। सूर्य देव का यह रूप बहुत ही तेजस्वी है यह अशुभता और पाप का नाश कर उत्तम फल प्रदान करने वाला है। इस दिन सूर्य की पूजा करने से सुख सौभाग्य एवं स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
मार्तण्ड सप्तमी कथा (Martand Saptmi Katha)
दक्ष प्रजापति की पुत्री अदिति का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ। अदिति ने कई पुत्रों को जन्म दिया। अदिति के पुत्र देव कहलाये। अदिति की बहन दिति के भी कई पुत्र हुए जो असुर कहलाये। असुर देवताओं के प्रति वैर भाव रखते थे। वे देवताओं को मार कर स्वर्ग पर अधिकार प्राप्त करना चाहते थे। अपने पुत्रों की जान संकट में जानकर देवी अदिति बहुत ही दु:खी थी। उस समय उन्होंने सर्वशक्तिमान सूर्य देव (Surya Dev) की उपासना का प्रण किया और कठोर तपस्या में लीन हो गयी। देव माता अदिति की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें दर्शन दिया और वरदान मांगने के लिए कहा। सूर्य के ऐसा कहने पर देव माता ने कहा कि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे पुत्रों की रक्षा हेतु आप मेरे पुत्र के रूप में जन्म लेकर अपने भाईयों के प्राणों की रक्षा करें। सूर्य के वरदान के फलस्वरूप भगवान सूर्य का अंश अदिति के गर्भ में पलने लगा। सूर्य जब गर्भ में थे उस समय देवी अदिति सदा तप और व्रत में लगी रहती थी। तप और व्रत से देवी का शरीर कमज़ोर होता जा रहा था। महर्षि कश्यप के काफी समझाने पर भी देवी ने तप व्रत जारी रखा तो क्रोध वश महर्षि ने कह दिया कि तुम इस गर्भ को मार डालो।
महर्षि के ऐसे अपवाक्य को सुनकर अदिति ने गर्भ गिरा दिया। गर्भ उस समय उदयकालीन सूर्य के समान रूप धारण कर लिया और आकाशवाणी हुई हे ऋषि तुमने इस अण्ड को मार दिया है जो सूर्य का अंश है। ऋषि को यह जानकर पश्चाताप हुआ कि यह भगवान सूर्य के अंश के लिए उन्होंने बुरा भला कहा। अपने अपराध के लिए क्षमा मांगते हुए उन्होंनें सूर्य देव की वंदना की। वंदना से प्रसन्न होकर सूर्य ने महर्षि को क्षमा दान दिया और तत्काल उस अण्ड से अत्यंत तेजस्वी पुरूष का जन्म हुआ जो मार्तण्ड कहलाया। सूर्य देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है मार्तण्ड सप्तमी (Martand saptami) तिथि को। चुंकि सूर्य अदिति के गर्भ से जन्म लिये थे अत: ये आदित्य भी कहलाये।
मार्तण्ड सप्तमी पूजा व्रत विधि (Martand Saptami Pooja vrat Vidhi)
पौष शुक्ल पक्ष में जो लोग मार्तण्ड सप्तमी (Paush Shukla Martand Saptmi vrat )का व्रत रख कर सूर्य की उपासना करते हैं उन्हें चाहिए कि सूर्योदय पूर्व शैय्या का त्याग कर दें। नित्य क्रिया से निवृत होकर सूर्योदय के समय स्नान करें। स्नान के पश्चात संकल्प करके अदिति पुत्र सूर्य देव की पूजा करें। इस समय सूर्य भगवान को ओम श्री सूर्याय नम:, ओम दिवाकराय नम:, ओम प्रभाकराय नम: नाम से आर्घ्य दें एवं परिवार के स्वास्थ्य व कल्याण हेतु उनसे प्रार्थना करें। पूजा के बाद सूर्य कैसे अदिति के गर्भ में आये और क्यों मार्तण्ड कहलाये यह कथा सुनें और सुनायें।
सूर्य के इस रूप की पूजा से रोग का शमन होता है और व्यक्ति स्वस्थ एवं कांतिमय हो जाता है। शास्त्रों में इस व्रत को आरोग्य दायक कहा गया है। कहा भी गया है स्वास्थ्य से बड़ा कोई धन नहीं है इस धन की प्राप्ति हेतु सूर्योपासना करें।
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