Great Saint Ravidas jyanti Parv (महान संत रविदास जयंती पर्व)
भक्ति काल के महान संतों में गुरू रविदास का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। इन्होंने कई भक्ति पूर्ण रचनाएं की जिनकी मधुर धुन आज भी जन मानस को भाव विभोर कर देता है। इस महान संत को श्रद्धांजली देने के लिए प्रति वर्ष इनकी जयंती मनाई जाती है।
संत रविदास जीवनी ( Sant Ravidas Life)कबीरदास जी ने कहा है " जात पात पूछे न कोई, हरि को भजे सो हरि का होई" इस कथन को चरितार्थ करते हैं संत रविदास जी. रविदास जी कबीर के समकालीन थे. इनकी भक्ति निर्लोभ और छल से रहित थी. संतों के प्रति सेवा की भावना उनमें बाल्यकाल से दिखाई देती थी. जब बड़े हुए तो स्वयं महान संत हुए. इनका जीवन आज भी समाज के लिए प्रेरणादायक है. आज जहां भौतिकता, लालच और स्वार्थ सिर चढ़ कर बोल रहा है उसमें संत रविदास जी का चरित्र प्रेरणादायक है.
रविदास जी (Sant Ravidas) जन्म से तो चर्मकार थे परंतु कर्म से ब्राह्मण. जूते बनाकर अपना तथा अपने परिवार का पेट पालते थे, स्वयं गरीबी में रहते परंतु संतों की सेवा में सदैव तत्पर रहते. कथा है कि एक बार एक पंडित महोदय गंगा यात्रा के लिए रविदास जी के पास जूते खरीदने आये. बातों बातों में गंगा पूजन की बात निकल चली. रविदास जी ने तब उन पंडित महोदय को बिना दाम लिये ही जूता दे दिया और विनती की हे पंडित महोदय आप मेरी ओर से एक सुपारी गंगा मैया को भेट कर देना. रविदास जी की निश्छल प्रेम और भक्ति ऐसी थी कि जब पंडित महोदय सुपारी गंगा मैया को भेट कर रहे थे तब गंगा मैया का हाथ प्रकट हुआ और उसने सुपारी ग्रहण कर लिया.
इस कथा से रविदास जी (Sant Raidas) की भक्ति का स्वरूप उजागर होता है. एक अन्य कथा से उनके संत हृदय का भी बोध सहज होता है. कथा के अनुसार रविदास जी की गरीबी को दूर करने के लिए स्वयं भगवान एक बार साधु स्वरूप में उनके समक्ष आये. साधु रूप में आये भगवान ने रविदास जी को पारस पत्थर दिया जो लोहे को छू दे तो सोना बन जाए. रविदास जी (Sant Ravidas) वह पत्थर लेना नहीं चाहते थे क्योंकि वह माया के जाल में उलझ कर प्रभु भक्ति की पूंजी नहीं खोना चाहते थे. जब साधु ने पारस पत्थर लेने की बहुत जिद्द की तब रविदास जी ने कहा आप इसे छप्पर में कहीं डाल दीजिए.
साल भर बाद फिर से साधु महोदय आये और पारस पत्थर वापस देने के लिए कहा. रविदास जी ने कहा साधु महोदय जहां आपने उस पत्थर का रखा था वहीं से निकाल लीजिए. रविदास जी की बात सुनकर साधु धन्य धन्य कह उठे क्योंकि वास्तव में साधु वही है जो लोभ रहित हो और परोपकार एवं परमार्थ के लिए जीवित रहे.
वास्तव में रविदास जी सच्चे संत थे, न उनमें अभिमान और न ही किसी प्रकार का दंभ (Great Sant Raidas). एक बार कि बात है रविदास जी मंदिर में कीर्तन में शामिल हुए प्रसाद वितरण के समय उस समय के एक महान संत ने कहा भक्त बरतन तो है नहीं प्रसाद कहां लोगे. रविदास वहीं पड़ा जूता उठाकर कहा महाराज इसी में प्रसाद दे दीजिए, रविदास जी की बात सुनकर उस संत ने कहा तुम परीक्षा में सफल हुए तुम सचमुच संत हो. कहते हैं वहां मीराबाई भी मौजूद थी और उन्होंने उसी समय रविदास जी को अपना गुरू बना लिया.
इस विनम्र भाव के संत का जन्म माघ मास में पूर्णिमा तिथि को 1433 ई में हुआ था (Magha Masa shukla paksha Punrima Sant Ravidas Jyanti). रविदास जी संत रमानन्द के शिष्य थे जो संत कबीर के भी गुरू थे इस दृष्टि से रविदास जी और कबीर दास जी दोनों गुरू भाई थे. इन्होंने निरगुण ब्रह्म की उपासना की और राम से प्रीति लगाई. इन्होंने राम, रहीम, कृष्ण, करीम को एक कहा. ये वेद और कुरान को एक जैसा आदर देते थे. इन्होंने लिखा भी है "कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा. वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा.."
भक्ति में बाह्याडम्बर इन्हें पसंद नहीं था. ये सरल और सहज भव से भरी भक्ति में आस्था रखते थे. इनका कहना था "मन चंगा तो कढ़ौती में गंगा". 14 वीं सदी के भक्ति मार्ग के महान संतों में रविदास जी का ऊँचा स्थान है. इनकी रचना प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकि अंग अंग बास समानि." इनकी भक्ति की चासनी से सराबोर है.
समाजिक एकता और सौहार्द के प्रतीक रविदास जी की जयन्ती प्रतिवर्ष माघ शुक्ल पूर्णिमा के दिन बहुत ही धूम धाम से मनायी जाती है. इस दिन गुरू रविदास (Guru Ravidas) के मंदिर में लोग एकत्रित होते हैं और उनसे प्रभु के प्रति निष्कपट और निर्लोभ भक्ति का आशीर्वाद मांगते हैं.
मानवतावादी इस संत की शिक्षा और उनके आदर्श से सीख लेने की आज बहुत ही आवश्यकता है. माया के जाल में फंसे हुए आज के मनुष्य प्रभु के सामने जब शीश झुकाते हैं तब भी धन की याचना करते हैं ऐसे में रविदास जी की भक्ति और कर्म एवं धर्म पालन की भावना हमारा कल्याण कर सकता है.
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