Holi Colour festival (होली रंगोत्सव)

by Acharya Shashikant on November 3, 2008 · 0 comments

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होली कथा (Holi katha)

होली का त्यहार भारतवर्ष में अति प्रचीन काल से मनाया जाता आ रहा है. इतिहास की दृष्टि से देखें तो यह वैदिक काल से मनाया जाता आ रहा है. हिन्दु मास के अनुसार होली के दिन से नये संवत् की शुरूआत होती है. चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के दिन धरती पर प्रथम मानव मनु का जन्म हुआ था. इसी दिन कामदेव का पुनर्जन्म हुआ था. इन सभी खुशियों को व्यक्त करने के लिए रंगोत्सव मनाया जाता है. इसके अलावा हुड़दंग और रंगोत्सव का यह भी कारण बताया जाता है कि नृहसिंग रूप में भगवान इसी दिन प्रकट हुए थे (Narasimasha Avtar) और हिरण्यकश्यपु नामक महाअसुर का वध कर भक्त प्रह्लाद को दर्शन दिया थे.

श्री कृष्ण की होली (Sri Krishna Holi)

त्रेतायुग में विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्णचंद और राधा रानी की होली ने रंगोत्सव में प्रेम का रंग भी चढ़ाया. श्री कृष्ण होली के दिन राधा रानी के गांव बरसाने जाकर राधा और गोपियों के साथ होली खेलते थे. कृष्ण की लीला ने होली को और भी आनन्दमय बना दिया और यह प्रेम एवं अपनत्व का पर्व बन गया. इस दिन लोग आपसी कटुता और वैर भाव को भुलाकर एक दूसरे को इस प्रकार रंग लगाते हैं कि लोग अपना चेहरा भी नहीं पहचान पाते हैं. रंग लगने के बाद मनुष्य शिव के गण के समान लगने लगते हैं जिसे देखकर भोले शकर भी प्रसन्न होते हैं, यही कारण है कि औढ़र दानी महादेव के भक्त इस दिन शिव और शिव भक्तों के साथ होली के प्यार भरे रंगों का आनन्द लेते हैं व प्रेम एवं भक्ति के आनन्द में डूब जाते हैं.

होली के विभिन्न रंग (Holi colour)

शिव शंकर को भंग बहुत ही पसंद है यही कारण है कि होली के दिन लोग भंग की ठंढ़ई बनाकर स्वयं भी पीते हैं और लोगों को भी पिलाते हैं. होली के दिन रंग बिरंगे पकवान और मिठाईयों का भोग भगवान को लगाकर लोग प्रसाद स्वरूप स्वयं भी इसका आनन्द लेते हैं. होली के दिन प्रेम के प्रतीक देवता कामदेव पुनर्जीवित हो उठे थे अत: इसे मदनोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है. प्रेम और आनन्द में डूबे लोग संध्या काल में नये नये वस्त्र पहनकर एक दूसरे के घर जाते हैं और बड़ों के पैरों पर गुलाल रखकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और मित्रों के चेहरे पर गुलाल मल कर गले लगते हैं.

वास्तव में होली का त्यहार अपने आपमें एक ऐसा उत्सव है जिसमें प्रेम का व्रत भी शामिल है. प्रेम ऐसा व्रत है जिसकी अनुशंसा ज्ञानी ऋषि मुनी, सिद्ध संत और देवता भी करते हैं.

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