Pitri paksha Shradh (पितृ पक्ष और श्राद्ध)
आत्मा की अमरता के सिद्धान्त को तो स्वयं भगवान श्री कृष्ण गीता में उपदेशित करते हैं. आत्मा जब तक अपने परम+आत्मा से संयोग नहीं कर लेता तब तक विभिन्न योनियों में भटकता है और इस दौरान उसे श्राद्ध कर्म से संतुष्टि मिलती है. श्राद्ध की बड़ी ही महिमा कही गयी है.
श्राद्ध के विषय में कई प्रकार की बातें सामने आती हैं परंतु सूक्ष्म रूप में देखें तो श्राद्ध श्रद्धा का दूसरा नाम है जिसमें पितरों के प्रति भक्ति और उनके प्रति कृतज्ञता का समावेश होता है. श्राद्ध कर्म के विषय में अपस्तम्ब ऋषि कहते हैं कि जैसे यज्ञ के माध्यम से देवताओं को भाग और शक्ति प्राप्त होती है उसी प्रकार श्राद्ध एवं तर्णण क्रिया से पितृ लोक में बैठे पितरों को उनका अंश प्राप्त होता है.
श्राद्ध मास (Shradh Masa)
हिन्दु पंचाग में पितरों के श्राद्ध कर्म के लिए एक विशेष समय निर्घारित किया गया है जिसे पितृ पक्ष के नाम से जाना जाता है. यह पक्ष आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तक रहता है जिसमें व्यक्ति अपने पितरों अर्थात अपने मृत पिता, दादा एवं परदादा के नाम से श्राद्ध करते हैं. शास्त्रों में पितरों के भी कई श्रेणी बताए गये हैं जिनमें भाग के अधिकारी इन्हें ही बताया गया है इनके ऊपर के पितृगणों को पूर्वज की श्रेणी में रखा गया है.
श्राद्ध कर्म को शास्त्रों में काफी महत्व दिया गया है. यह माना जाता है कि जिस तिथि को व्यक्ति की मृत्यु होती है उस तिथि के दिन मृत व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर पितृ लोक से उस स्थान पर लौट कर आता है जहां पर उसकी मृत्यु हुई थी. अगर उस तिथि को उनके नाम से श्राद्ध नहीं होता है तो वे उस जगह से भूखे प्यासे दु:खी होकर लौट जाते हैं और उनके वंश में जीवित पुत्र-पौत्रों को श्राप देते हैं जिससे सुख शांति चली जाती है. इनके श्राप से कुल की वृद्धि नहीं होती है अर्थात व्यक्ति पुत्रहीन हो जाता है और उसे भी मरने पर अन्न जल प्राप्ति नहीं होती है व उन्हें दु:ख भोगना होता है.
श्राद्ध कथा (hSradh Katha)
श्राद्ध के संदर्भ में एक कथा यहां उल्लेखनीय है कि धर्मराज युधिष्ठिर भीष्म से पश्न करते हैं कि जब व्यक्ति अपने कर्म के अनुसार अलग अलग योनि में जन्म लेते हैं तब श्राद्ध की क्या आवश्यकता है. इस पर भीष्म अपना अनुभव सुनाते हैं कि यह कर्म किस प्रकार आवश्यक और फलदायक है. भीष्म कहते है एक बार जब मैं अपने पिता का श्राद्ध कर रहा था उस वक्त मेरे पिता मेरे सम्मुख आये और उन्होंने हाथ बढ़ाकर कहा कि हे पुत्र पिण्ड मेरे हाथ पर रख दो. मैं अपने पिता का हाथ और उनकी वाणी पहचान गया लेकिन शास्त्र का आचरण करते हुए मैंने पिण्ड कुश पर रख दिया जिससे पिता ने मुझे इच्छा मृत्यु का वरदान दिया.
ब्रह्मपुराण में और गरू़ड़ पुराण में श्राद्ध कर्म पर काफी विस्तार से बताया गया है. इनके अनुसार पितर चाहे किसी भी योनि में हों परंतु पुत्रों एवं पौत्रों के द्वारा किया गया श्राद्ध का अंश स्वीकार करते हैं इससे पितृगण पुष्ट होते हैं और उन्हें नीच योनियों से मुक्ति भी मिलती है. यह कर्म कुल के लिए कल्याणकारी है.
गया श्राद्ध (Gaya Shradh)
श्राद्ध के संदर्भ में गया में पिण्डदान का काफी माहत्मय है. मान्यता है कि अगर आपको अपने पितृगणों की पुण्य तिथि नहीं पता है व आपको यह लगता है कि आप अपने पितृगणों का श्राद्ध हर वर्ष कर पाने में सक्षम नहीं है तो अपने पितरों को आमंत्रित कर कहें कि हे पितृगण मैं आपके लिए गया में पिण्डदान के लिए जा रहा हूं आप मेरे साथ चलें और मेरे द्वारा दिया गया पिण्ड ग्रहण कर हमें मुक्ति दें. इस तरह से जब आप गया पहुंचकर पिण्डदान देंगे उसके पश्चात पितृगण के कर्तव्य से आप मुक्त हो जाते हैं.
काम्य, नैमित्तिक, वृद्धि, एकोद्दिष्ट तथा पार्वण ये पांच प्रकार के श्राद्ध कर्म हैं जिनका जिक्र आश्वलायन ने किया है(Ashwalayan describe the following five types of funeral rites - Kamya, Naimittik, Vridhhi, Ekodist, and Parvan). श्राद्ध में पिण्डदान की यह भी महत्ता है कि अगर आपके घर संतान का जन्म नहीं हो रहा है तो पितामह के नाम से दिया गया पिण्ड उठाकर अपनी पत्नी को खिलायें इससे पितृगणों के आशीर्वाद से आपके घर संतान का जन्म होता है. आप अपने कुल परिवार की वृद्धि एवं सुख समृद्धि की कामना करते हैं तो आपको भी पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण के द्वारा पितरों की सेवा करनी चाहिए.
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