Arti – Krishna Kunjvihari – आरती कुँज बिहारी की

by Acharya Shashikant on December 17, 2008 · 3 comments

in Arti

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आरती कुँज बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

गले में वैजन्ती माला,
बजावे मुरली मधुर बाला,
श्रवण में कुण्डल झलकाला,
नन्द के नन्द,
श्री आनन्द कन्द,
मोहन ब„⣞ज चन्द
राधिका रमण बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

गगन सम अंग कान्ति काली,
राधिका चमक रही आली,
लसन में ठाड़े वनमाली,
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चन्द्र सी झलक
ललित छवि श्यामा प्यारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

जहाँ से प्रगट भयी गंगा,
कलुष कलि हारिणि श्री गंगा,
स्मरण से होत मोह भंगा,
बसी शिव शीश,
जटा के बीच,
हरे अघ कीच
चरण छवि श्री बनवारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै,
देवता दरसन को तरसै,
गगन सों सुमन राशि बरसै,
अजेमुरचन
मधुर मृदंग
मालिनि संग
अतुल रति गोप कुमारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

चमकती उज्ज्वल तट रेणु,
बज रही बृन्दावन वेणु,
चहुँ दिसि गोपि काल धेनु,
कसक मृद मंग,
चाँदनि चन्द,
खटक भव भन्ज
टेर सुन दीन भिखारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

{ 3 comments… read them below or add one }

Sai kumar May 10, 2010 at 3:48 am

Good

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ajay May 14, 2013 at 5:25 pm

ak

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kalpesh kumath February 8, 2014 at 8:21 am

very good

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