Amalaki Ekadashi vrat katha vidhi (आमलकी एकादशी व्रत कथा विधि)

आमलकी एकादशी महात्मय (Amalaki Ekadashi Mahatmya)

प्रकृति से मानव का सम्बन्ध आदि काल से है. मनुष्य सृष्टि के प्रारम्भ से ही प्रकृति की उपासना करता आ रहा है. वृक्ष में देवताओं का वास मानकर वृक्ष की उपासना भी की जाती रही है. पीपल और आंवले के वृक्ष को देवतुल्य मानकर उनकी आराधाना की जाती रही है, आमलकी एकादशी (Amalki Ekadasi) का व्रत इसी का प्रमाण है.

आमलकी यानी आंवले को शास्त्रों में उसी प्रकार श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है जैसा नदियों में गंगा को प्राप्त है और देवों में भगवान विष्णु को. विष्णु जी ने जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा को जन्म दिया उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को जन्म दिया. आंवले को भगवान विष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया है. इसके हर अंग में ईश्वर का स्थान माना गया है. भगवान विष्णु ने कहा है जो प्राणी स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं उनके लिए फाल्गुन शुक्ल पक्ष में जो पुष्य नक्षत्र में एकादशी (Falgun Shukla Pusya Nakshatra Ekadashi)  आती है उस एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है. इस एकादशी को आमलकी एकादशी (Amlki Ekadasi) के नाम से जाना जाता है.

आमलकी एकादशी व्रत विधि (Amalaki Ekadasi vrat Vidhan):

इस एकादशी के दिन प्रात: स्नान करके भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष हाथ में तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर संकल्प करें कि मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रखता हूं. मेरा यह व्रत सफलता पूर्वक पूरा हो इसके लिए श्री हरि मुझे अपनी शरण में रखें. संकल्प के पश्चात षोड्षोपचार सहित भगवान की पूजा करें.

भगवान की पूजा के पश्चात पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करें. सबसे पहले वृक्ष के चारों की भूमि को साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें. पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें. इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमत्रित करें. कलश में सुगन्धी और पंच रत्न रखें. इसके Šৠपर पंच पल्लव रखें फिर दीप जलाकर रखें. कलश के कण्ठ में श्रीखंड चंदन का लेप करें और वस्त्र पहनाएं. अंत में कलश के Šৠपर श्री विष्णु के छठे अवतार परशुराम ( Parshuram Sixth incarnation vishnu) की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुराम जी की पूजा करें. रात्रि में भगवत कथा व भजन कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें.

द्वादशी के दिन प्रात: ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा दें साथ ही परशुराम की मूर्ति सहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें. इन क्रियाओं के पश्चात परायण करके अन्न जल ग्रहण करें.

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