Gauri tapovrat katha vidhi (गरी तपोव्रत कथा विधि)

गरी तपोव्रत महात्मय (Gauri Tapovrat Mahatmya)

मार्गशीर्ष अमावस्या तिथि को महिलाएं अति उत्तम मानती हैं. यह तिथि गरी तपोव्रत के नाम से जानी जाती है. इस दिन महिलाएं अन्न जल का त्याग कर व्रत करती हैं. कुमारी कन्याएं योग्य वर पाने की इच्छा से यह व्रत रखती हैं और विवाहित स्त्रियां अपने पति और सुहाग की मंगल कामना से यह व्रत रखती हैं. शास्त्रों कें अनुसार इस व्रत का आधार माता गरी द्वारा पति रूप में शिव को पाने के लिए किया जाने वाला व्रत है.

गरी अत्यंत दयालु और कृपालु हैं. उनकी कृपा से सुहागिन स्त्रियो का सुहाग चिन्ह दमकता रहता है. कुंवारी कन्याओं को सुन्दर और सुयोग्य वर मिलता है व गृहस्थ जीवन ध्रर्मानुकूल एवं सुख शांतिमय रहता है. माता गरी सदा अपने भक्तों पर ममता लुटाती हैं व उनकी हर मनोकामना पूरा करती है.

गरी तपोव्रत विधि (Gauri Tapovrat Vidhi)

मां गरी ने जिस प्रकार भगवान भोलेनाथ को पाने के लिए कठोर तपोव्रत किया और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई उसी प्रकार गरी तपोव्रत करने वाले की सभी मानोकामना मां गरी और भगवान शंकर पूर्ण करते हैं. यह तपोव्रत मार्गशीर्ष की कृष्ण पक्ष में अमावस्या तिथि (Margshirsha Amavasya Gauri Tapovrat) के दिन किया जाता है.

इस व्रत को महिलाएं करती हैं, क्योंकि यह उनके लिए विशेष मंगलकारी है . इस व्रत को रखने कि विधि यह है कि व्रती को सुबह ब्रह्म मुर्हूत में उठकर स्नान करना चाहिए और शिव पार्वत की पूजा करनी चाहिए. दिन के वक्त देवी पार्वती और भगवान भोले नाथ का भजन कीर्तन करना चाहिए और उन्हीं में मन को लगाना चाहिए. संध्या काल में गरी मैथ्या और शिव जी के नाम से दीप दान करना चाहिए.

इस व्रत का विशेष विधान यह है कि व्रती को मध्य रात्रि में मन्दिर में जाकर शिव पार्वती की पूजा करनी चाहिए. शास्त्रानुसार अगर आप यह व्रत करती हैं तो आपको व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब आप निरन्तर सोलह वर्ष तक इस व्रत का पालन करती हैं. जब सोलह वर्ष पूर्ण हो जाए तब मार्गशीर्ष पूर्णिमा तिथि को व्रत का उद्यापन यानी समापन करें.

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