Vaitarni Vrat Katha (वैतरणी व्रत कथा)

वैतरणी व्रत महात्मय (Vaitarni Vrat Mahatmya)

यह परम सत्य है कि जो प्राणी इस धरती पर जन्म लेता है उसकी मृत्यु होती है अत: इसे मृत्युलोक कहा गया है. मृत्युलोक में जब प्राण छूटता है तब जीव को अपने कर्मों के अनुरूप विभिन्न लोकों में स्थान मिलता है. इस क्रम में जीव को वैतरणी नदी पार करना होता है जो बहुत ही दुर्गम है. जीव मृत्यु के पश्चात इस नदी को पार कर सके इसके लिए वैतरणी व्रत किया जाता है.

वैतरणी व्रत (Vaitarni Vrat) के महात्मय पर चर्चा करने से पूर्व आइये हम मृत्यु के पश्चात जीव को किस प्रकार का भोग भोगना पड़ता है इस पर चर्चा करें. गरूड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के पश्चात तेरह रात्रि तक जो पितर के कर्म होते हैं उससे अंगूठे के आकार का सूक्ष्म शरीर बनता है. यह शरीर मृत व्यक्ति के समान ही दिखता है. यह शरीर जीवित अवस्था में व्यक्ति द्वारा किये गये कर्म का फल भोगने के लिए बनता है. इस शरीर को यमदूत बांधकर घसीटते हुए ताम्बे के समान तपते रास्तों से ले जाते हैं. इस रास्ते में कर्म की गति के अनुसार उस शरीर को भयंकर यातना मिलती है. इसी मार्ग में वैतरणी नदी (Vaitarni Nadi) है. इस नदी में भयानक जल जीव हैं जो इस सूक्ष्म शरीर को आहार बनाने के लिए तत्पर रहते हैं.

वैतरणी नदी (Vaitarni Nadi) वह व्यक्ति पार नहीं कर पाता है जो महापापी होता है, वह वहीं डूबता उतरता रहता है. इस स्थिति में जलीय जीव उसके शरीर को नोंचता है और वह पीड़ से कराहता रहता है. जो व्यक्ति धर्मानुसार कर्म करते हैं वह इस नदी को भगवान विष्णु का नाम लेता हुआ पार कर जाता है. कथा के अनुसार इस नदी में श्यामा नामक एक गाय है जिसकी पूंछ पकड़कर सद्कर्म करने वाले उसी प्रकार नदी को पार कर जाते हैं जैसे नैका पर चढकर कोई नदी पार करता है.

वैतरणी व्रत विधि (Vaitarni Vrat Vidhi)

वैतरणी व्रत का प्रभाव यही है कि जो व्यक्ति यह व्रत करता है वह इस वैतरणी नदी को बिना किसी कष्ट के क्षण भर में पार कर लेता है. यह व्रत मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष एकादशी (Margshirsha Krishna Ekadasi) के दिन किया जाता है. इस व्रत में व्रत करने वाले को नियम निष्ठा के साथ दिन के समय भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए. रात में श्यामा गाय यानी काले रंग की गाय की श्रद्धा भक्ति पूर्वक पूजा करें. पहले गाय की सिंग और खुर को धोएं फिर उनपर चंदन आदि का लेप करें. इसके पश्चात मुख से लेकर पूंछ तक सभी अंगों की पूजा करें. पूजा के पश्चात अपने सामर्थ्य के अनुसार पुरोहित को दान दक्षिण देकर विदा करें.

इस व्रत से मिलने वाले पुण्य का उल्लेख गरूड़ पुराण सहित अन्य पुराणों में भी मिलता है. मृत्यु के पश्चात जीव की क्या गति होती है यह तो कोई नहीं जानता है अत: शास्त्रानुकूल कर्म करना ही उचित है. लगभग सभी धर्म में कर्मफल के अनुसार नर्क और स्वर्ग की परिकल्पाना की गई है अत: हमें जन्म जन्म के फेर से छूटने का उपाय करना चाहिए यही मानव जीवन का मूल उद्देश्य है क्योंकि अन्य योनियों में यह अवसर नहीं मिलता है. इस योनि में अगर पुण्य अर्जित नहीं किये तो पता नहीं कितनी योनियों में पुन: भटकना पड़े.

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3 Comments

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  1. 12 November, 2016 09:06:00 AM Tanisha Agrawal

    How to do this vrat? And vidhi, katha, udyapan and when to do it?

  2. 09 November, 2011 09:08:16 AM sunil

    here you have mentioned only one day where as pandits give various muhurats for the same

  3. 09 November, 2011 09:07:33 AM sunil

    many pandits doing it along with tulsi vivah, by doing havan and givin ahuti's in that and asking for many types of donations along with dakshina.....

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