Akshay Navmi Katha mahatya (अक्षय नवमी कथा एवं महात्मय)

भारत को देव की भूमि कहा गया है. भारतीय दर्शन और अध्यात्म विश्व के लिए रहस्यात्मक विषय रहा है. यहां के मनुष्यों का सीधा सम्बन्ध देवताओं से रहा है. हमारे प्राचीन ऋषि मुनियो को पता था कि जब कलियुग का आगमन होगा तो धर्म का लोप होने लगेगा ऐसे में मनुष्य को अधोगति से बचाने हेतु उन्होंने अनेक मार्ग एवं उपाय बताये. इनमें से एक है अक्षय नवमी.

अक्षय नवमी महात्मय (Akshay Navmi Mahatya)

कथा है कि एक बार भगवान से पूछा गया कि हे प्रभु कलियुग में मनुष्य भतिक एवं दैहिक सुख में इस तरह लिप्त हो जाएगा कि तपस्या एवं धर्म के लिए उनके पास समय ही नहीं होगा. मनुष्य की जब ऐसी गति होगी तब वह नीच योनियों में जाकर अत्यंत घोर यातना सहने के लिए विवश होगें और धर्म के नष्ट होने से सृष्टि का विनाश हो जाएगा. इस महाकलियुग में मनुष्य किस प्रकार से पाप मुक्त हो सकता है. भगवान ने इस प्रश्न के जवाब में कहा कि कलियुग का प्रभाव ही ऐसा है लेकिन जो प्राणी इस युग में हथेली से सरसों के दाने को गिरने में जितना वक्त लगता है उतने समय तक भी मुझे एकाग्र हो कर ध्यान करता है तो उसे तपस्या का फल मिलेगा.

यहां यह कथा दृष्टांत स्वरूप दिया गया है ताकि आप समझ सकें कि अक्षय नवमी का प्रभाव भी इसी प्रकार है. कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि को अक्षय नवमी कहा गया है. इस तिथि के विषय में भगवान कहते है अक्षय नवमी मे जो भी पुण्य और उत्तम कर्म किये जाते हैं उससे प्राप्त पुण्य कभी नष्ट नहीं होते, यही कारण है कि इसे नवमी तिथि को अक्षय नवमी कहा गया है. इस दिन प्रात: काल स्नान करके भगवान विष्णु और शिव जी के दर्शन करने से अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है. इस तिथि को पूजा, दान, यज्ञ, तर्पण करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है.

शास्त्रों में ब्रह्महत्या को घोर पाप बताया गया है. यह पाप करने वाला अपने दुष्कर्म का फल अवश्य भोगता है, लेकिन अगर वह अक्षमय नवमी के दिन स्वर्ण, भूमि, वस्त्र एवं अन्नदान करे वह आंवले के वृक्ष के नीचे लोगों को भोजन करायें तो इस पाप से मुक्त हो सकता है. इस नवमी को आंवले के पेड़ के नीचे भोजन करने व कराने का बहुत महत्व है यही कारण है कि इसे  धातृ नवमी भी कहा जाता है. धातृ आंवले को कहा जाता है. इस तिथि को आंवले के वृक्ष की पूजा एवं इसके नीचे भोजन करने का विधान क्यों है इसके संदर्भ में एक पराणिक कथा है.

अक्षय नवमी कथा (Akshay Navmi Katha)

कथा के अनुसार, एक बार देवी लक्ष्मी तीर्थाटन पर निकली तो रास्ते में उनकी इच्छा हुई कि भगवान विष्णु और शिव की पूजा की जाय. देवी लक्ष्मी उस समय सोचने लगीं कि एक मात्र चीज़ क्या हो सकती है जिसे भगवान विष्णु और शिव जी पसंदीद करते हों उसे ही प्रतीक मानकर पूजा की जाय. इस प्रकार काफी विचार करने पर देवी लक्ष्मी को ध्यान पर आया कि धात्री ही ऐसी है जिसमें तुलसी और विल्व दोनों के गुण मजूद हैं फलत: इन्हीं की पूजा करनी चाहिए. देवी लक्ष्मी तब धात्री के वृक्ष की पूजा की और उसी वृक्ष के नीचे प्रसाद ग्रहण किया. इस दिन से ही धात्री के वृक्ष की पूजा का प्रचलन हुआ.

अक्षय नवमी पूजा विधि (Akshay Navmi Pooja Vidhi)

अक्षय नवमी के दिन संध्या काल में आंवले के पेड़ के नीचे भोजन बनाकर लोगों को खाना खिलाने से बहुत ही पुण्य मिलता है. ऐसी मान्यता है कि भोजन करते समय थाली में आंवले का पत्ता गिरे तो बहुत ही शुभ माना जाता है साथ ही यह संकेत होता है कि आप वर्ष भर स्वस्थ रहेंगे.

अक्षय नवमी के विषय में कहा जाता है कि इस दिन ही त्रेता युग का आरम्भ हुआ था। इसे कहीं कहीं कुष्मांडी नवमी (Kushmandi Navmi) के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि देवी कुष्माण्डा (Devi Kushmanda) इसी दिन प्रकट हुई थीं. इस दिन का पूजा विधान इस प्रकार है. आंवले के वृक्ष के सामने पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठें. धातृ के वृद्ध की पंचोपचार सहित पूजा करें फिर वृक्ष की जड़ को दूध से सिंचन करें। कच्चे सूत को लेकर धात्री के तने में लपेटें अंत में घी और कर्पूर से आरती और परिक्रमा करें.

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