Govatsa pooja katha (गोवत्स पूजन कथा)

कार्तिक कृष्ण पक्ष द्वादशी के दिन गाय और बछड़े की पूजा का विधान है. इस दिन पुत्रवती स्त्रियां व्रत भी रखती हैं. इस व्रत को कहीं गोवत्स के नाम से जाना जाता है तो कहीं बच्छदुआ के नाम से. अलग अलग प्रांतों में इस व्रत के नाम अलग हैं लेकिन व्रत का उद्देश्य और फल एक ही है. इस व्रत का उद्देश्य पुत्र की सलामती है.

गोवत्स बच्छदुआ व्रत कथा (Govatsa Bachdua vrat Katha)

कथा है कि भगवान श्री कृष्ण जब पहली बार ग चराने जा रहे थे तो उनकी मैया यशोदा ने आँगन लीप कर गाय और बछड़ों की पूजा की और साथ ही श्री कृष्ण को टीका लगाया और उनकी आरती उतारी फिर कृष्ण के साथ गायों को विदा कर दिया. श्री हरि की सभी कलाअसें ये युक्त परम पुरूषोत्तम भगचान कष्ण्चंद द्वारा गायों को पहली बार चराने हेतु ले जाने के उपलक्ष्य में श्रद्धालु महिलाएं यह व्रत रखती हैं.

अन्य कथा के अनुसार प्राचीन काल में किसी गांव में एक बूढ़ी महिला अपनी पुत्रवधू के साथ रहती थी. पुत्रवधू अपनी सास की हर आज्ञा का पालन करती थी. एक दिन की बात है सासु मां स्नान के लिए नदी जा रही थी. जाते हुए उन्होंने कहा कि आंगन में जो घास है वह काट कर बच्छी यानी बछड़े को दे दो और मच्छी यानी मछली को हांडी में पकने दे दो. बहू अपने काम में मग्न थी इसलिए सासु मां की बात को ठीक से सुन नहीं पायी और उसे लगा कि सासु ने कहा है बच्छी काटकर पकने देने के लिए, ऐसा सोचकर उसने बच्छी को मार कर हंडी में पका दिया. सास जब स्नान करके आयी तो सब बातें जानकर बहुत दु:खी हो गयी. और उसे लगा कि इस घटना के कारण उसके बेटे पर प्राण का संकट आने वाला है अत: जिद कर बैठी की जब तक बच्छी जीवित नहीं होती वह अन्न जल ग्रहण नहीं करेगी.

सासु मां के इस जिद्द को देखकर बहु भी घबरा गयी और आटे की लोई से बछड़ा बनाकर व्रत और पूजन किया. व्रत और पूजा के प्रभाव से गोधूली के समय जब गाय लटी तो उसके साथ उसकी बच्छी भी पीछे पीछे आ रही थी. इसे देखकर सास को अति प्रसन्नता हुई और उसके बेटे के जीवन पर आने वाला संकट टल गया. इस दिन से महिलाएं पुत्र की लम्बी आयु के लिए कार्तिक कृष्ण की द्वादशी तिथि को ब्रत रखने लगी जो बच्छ दुआ व्रत के नाम से जाना जाता है.

गोवत्स व्रत पूजा विधान (Govatsa vrat Pooja Vidhan)

इस व्रत में पूजा का विधान यह है कि व्रती नदी या तालाब में स्नान करते हैं. स्नान के बाद आंटे की लोई से गाय और बछड़ा बनाय जाता है. इन गाय और बछड़ों की दीप आदि से पूजा की जाती है. संध्या के समय जब गाएं चर कर घर वापस आती हैं तब आंगन में गाय की पूजा धूप, दीप, चंदन, नैवेद्य आदि के साथ की जाती है.

इस पूजा में धान का चावल प्रयोग नहीं करना चाहिए ऐसी मान्यताएं हैं. इस व्रत में पूजा हेतु काकुन के चावल का प्रयोग अक्षत के रूप में किया जाता है. कोदो का चावल और चने की दाल तथा काकुन के चावल का भोजन इस व्रत में उत्तम माना गया है. इस व्रत में व्रत करने वालों के लिए गाय का दूध, दही, घी एवं गाय के दूध से बने पदार्थ वर्जित बताये गये हैं.

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11 Comments

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  1. 14 September, 2018 10:34:27 PM Stephan66

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    Sirf marwadi prantoh mein yeh bhadva mein manaya jata hain....dusre rajyo mein arthat uttar Pradesh, bihar, aur anya rajyo mein yahan Karthik mein Manaya jata hain

  3. 29 August, 2016 10:08:13 AM Nishi

    Thanku so much.... Katha pahli baar padi but maja aa gaya jaankari milne se atyant prasann hun

  4. 28 August, 2016 05:25:22 PM D Singh

    Very thankfull To be available for everyone

  5. 09 September, 2015 08:23:21 AM Sumit

    Thanku..... Bt ye festival bhadrapad mein manaya jata h

  6. 09 September, 2015 06:58:35 AM Sneha Goyal

    Thanks! pehali bar katha padhi aur is din ka asali mahtav jana! ab hamesha yad se aj ke din Gay aur bachade ki pooja karungi! Thanks a lot!

  7. 02 September, 2013 04:43:29 AM Rajbala

    THANKS for this thing is available on website.................

  8. 02 September, 2013 03:40:42 AM govindgoyal

    thanks

  9. 14 August, 2012 11:50:49 AM aruna maheshwari

    thank u somuch uk m rahkar gomata ki pooja to nahi kar payi per katha mil gayi..

  10. 14 August, 2012 05:40:37 AM dr mahendra chouhan

    thanks for upload

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