Durga Pooja Pratipada Tithi (दुर्गा पूजा प्रतिपदा तिथि)

दुर्गा पूजा प्रथम दिन (Durga Pooja First Day

किसी भी रूप में देखा जाय तो यह हिन्दु समाज का एक महत्वपूर्ण त्यहार है जिसका धार्मिक, अध्यात्मिक, नैतिक व सांसारिक इन चारों ही दृष्टिकोण से काफी महत्व है. भक्त जन इस अवसर पर माता दुर्गा के न रूपों की पूजा करते हैं अत:इसे नवरात्रा के नाम भी जाना जाता है. देवी के न रूप क्रमश: इस प्रकार हैं प्रथम-शैलपुत्री, दूसरी-ब्रह्मचारिणी, तीसरी-चन्द्रघंटा, चथी-कुष्मांडा, पांचवी-स्कंधमाता, छठी-कात्यायिनी, सातवीं-कालरात्री, आठवीं-महागरी, नवमीं-सिद्धिदात्री. देवी के इन्हीं न रूपों की पूजा का माहत्मय है नवरात्रे में. यहां पहली पूजा और कलश स्थापना के विषय में चर्चा प्रस्तुत है.

पूजा का त्यहार यूं तो दो बार आता है एक हिन्दु मास के अनुसार चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में (Chaitra Durga Puja  Ashwin Masa durga Pooja). चैत्र मास में देवी दुर्गा की पूजा बड़े ही धूम धाम से की जाती है लेकिन आश्विन मास का विशेष महत्व है. दुर्गा सप्तशती में भी आश्विन मास की शारदीय नवरात्रा की महिमा का विशेष बखान किया गया है. दोनों मासों में दुर्गा पूजा का विधान एक जैसा ही है, दोनों ही प्रतिपदा से दशमी तिथि तक मनायी जाती है.

आश्विन शुक्ल प्रतिपदा तिथि (Ashwin Shukla Paksha Pratipada tithi)

शारदीय नवरात्रा का प्रारम्भ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि  को  कलश स्थापन के साथ होता है. कलश को हिन्दु विधानों में मंगलमूर्ति गणेश का स्वरूप माना जाता है अत: सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है. कलश स्थापन के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है. भूमि की सुद्धि के लिए गाय के गोबर और गंगाजल से भूमि को लिपा जाता है. विधान के अनुसार इस स्थान पर सात प्रकार की मिट्टी को मिलाकर एक पीठ तैयार किया जाता है, अगर सात स्थान की मिट्टी नहीं उपलब्ध हो तो नदी से लायी गयी मिट्टी में गंगोट यानी गांगा नदी की मिट्टी मिलाकर इस पर कलश स्थापित किया जा सकता है.

दुर्गा पूजा शैलपुत्री पूजा विधि (Durga Pooja Shailputri Pooja Vidhi)

द्रुर्गा को मातृ शक्ति यानी स्नेह, करूणा और ममता का स्वरूप मानकर जब हम पूजा करते हैं तो ऐसी ममतामयी माता अपने बच्चों को कैसे भूल सकती हैं अत: इनकी पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दशदिक्पालों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी योगिनियों को भी आमंत्रित किया जाता और और कलश में उन्हें विराजने हेतु प्रार्थाना सहित बुलाया जाता है. कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है. इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और ज बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है और इससे सभी देवी-देवता की पूजा होती है. इसे जयन्ती (Jayanti) कहते हैं जिसे इस मंत्र के साथ अर्पित किया जाता है "जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते". इसी मंत्र से पुरोहित यजमान के परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर जयंती डालकर सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद देते हैं.

कलश स्थापना के पश्चात देवी दु्र्गा जिन्होंने दुर्गम नामक प्रलयंकारी असुर का संहार कर अपने भक्तों को उसके त्रास से यानी पीड़ा से मुक्त कराया उस देवी का आह्वान किया जाता है कि हे मां दुर्गा हमने आपका स्वरूप जैसा सुना है उसी रूप में आपकी प्रतिमा बनवायी है आप उसमें प्रवेश कर हमारी पूजा अर्चना को स्वीकार करें. देवी दुर्गा ने महिषासुर को वरदान दिया था कि तुम्हारी मृत्यु मेरे हाथों हुई है इस हेतु तुम्हें मेरा सानिध्य प्राप्त हुआ है अत: मेरी पूजा के साथ तुम्हारी भी पूजा की जाएगी इसलिए देवी की प्रतिमा में महिषासुर (Mahisasur) और उनकी सवारी शेर भी साथ होता है.

देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है. चुंकि भगवान शंकर की पूजा के बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती हे अत: भगवान भोले नाथ की भी पूजा भी की जाती है. प्रथम पूजा के दिन "शैलपुत्री" के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती है (Durga Pooja, Shailputri Pooja)

इस प्रकार दुर्गा पूजा की शुरूआत हो जाती है प्रतिदिन संध्या काल में देवी की आरती होती है. आरती में "जग जननी जय जय" और "जय अम्बे गरी" के गीत भक्त जन गाते हैं.

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